Wednesday, October 24, 2012

मत ढूंढ कमजोरियां मुझ में फ़राज़ 
तू भी तो शामिल है मेरी कमजोरियों में 

अजीब रंगों में गुज़री है ज़िंदगी अपनी 
दिलों पर राज़ किया और हमराज़ के लिए तरसते रहे 

उनकी जीत से होती है खुशी हमको 
मेरी हार का मेरे पास बस यही जवाब है 

अजीब अँधेरा है साक़ी तेरी महफ़िल में 
हमने दिल भी जलाया पर उजाला ना हुआ 

रोशनी मेरी वफ़ा की बहुत दूर तक जायेगी 
शर्त इतनी है कि सलीके से जलाना मुझको 

आज कसम है तुझे तेरे मैखाने की 
पिला इतना के ना खबर रहे ज़माने की 
ना सुकून माँगा ना राहत तुझसे
दर्द इतना दे कि तमन्ना न रहे दिल लगाने की 



Tuesday, October 9, 2012


उनको शिकायत है कि हम हर किसी को देख कर मुस्कराते हैं 
जाओ कोई उन्हें बता आओ, सब में हमें वही नज़र आते हैं 

सोचतें हैं हम भी सीख लें बेरुखी करना 
सब को प्यार देते देते  हम अपनी क़दर खो बैठे 
रास्ते कहाँ ख़त्म होते हैं ज़िन्दगी के सफ़र में 
मंजिलें वहीँ हैं, जहाँ ख्वाहिशें थम जाएँ 
ज़िंदगी की कशमकश में बहुत मसरूफ हूँ मै भी 
वक़्त का बहाना बना , अपनों को भूल जाना मुझे नहीं आता 
सुना है वो जब मायूस होतें हैं तो हमें बहुत याद करतें हैं                          तुम ही बताओ उनकी खुशियों की दुआ माँगू या  मायूसी की 


कब माँगा के वो ज़िंदगी मेरे नाम कर दें 
मुझे देख लें बस इतना काम करदे 
रोज़ बस एक बार याद कर लें मुझको 
हम इसी में ज़िंदगी तमाम करदें 


अगर तुम हमसे दूर रह कर खुश हो तो सदा खुश रहना 
खुदा गवाह है हमने सदा तेरी खुशियों की दुआ मांगी है 


सिर्फ अहसास बदल देता है दुनिया में शक्लें यारो 
वर्ना मुहब्बत और नफरत एक ही दिल से की जाती है 


कितना अज़ीब है मेरे यार का अंदाज़-ऐ-मुहब्बत 
एक ज़ख्म देता है रोज़ और कहता है अपना ख्याल रखना 

मानता हूँ मै,  कि  मेरे कातिल वही थे 
सारे शहर में तारीफ़ के काबिल भी वही थे 
कहते थे हम तेरे हैं और तेरे रहेंगे 
जब लगी महफ़िल दुश्मनों की 
सबसे आगे वही थे वही थे 
एक चेहरे के मुरीद हम कुछ इस क़दर हुए 
आईने के सामने भी अपनी सूरत नहीं दिखती


वक़्त के साथ हर चीज़ बदल जाती है 
हर याद, हर शै पर धूल चढ़ जाती है 
तस्वीर उनकी दिल के ऐसे कोने में रखी है 
जहां सांसें भी पूछ कर जाती है 



सुकून से आँखे बंद कर नहीं पाता रातों को 
टूटे हुए खवाब की किरचें चुभती हैं पुतली में



बेखबर हो गए हैं कुछ लोग 
वो हमारी ज़रूरत तक महसूस नहीं करते 
कभी बहुत बाते किया करते थे हमसे 
अब खैरियत तक पूछा नहीं करते 



मेरे ज़ख्मों की दवा कौन बनाएगा तेरे जाने के बाद  
हमने तो अपने भी खो दिए, तुझे पाने की खातिर 




 सज़ा बन जाती है गुज़रे हुए वक़्त की यादें 
जाने क्यूँ मतलब के लिए मेहरबान होते हैं लोग




कैसे भुला देते हैं लोग तेरी बनाई  खुदाई को ऐ रब्बा 
हमसे तो तेरा बनाया एक शख्स भी भुलाया ना  गया 




उदासियों की तो वजह बहुत हैं इस ज़माने मे 
पर बेवजह खिलखिलाने में मज़ा अलग ही आता है 



शीशे के थे ख्वाब, पता लगा उनके टूटने के बाद
अब अक्सर आँखों में किरचें चुभती हैं 

हर इंसान दिल का बुरा नहीं होता 
हर इंसान बेवफा नहीं होता
अक्सर बुझता है चिराग अपनी गलतियों से 
कसूर हर बार हवाओं का नहीं होता 

इस क़दर मुरीद हो गए हम एक चेहरे के 
कि आईने में भी अपनी सूरत नहीं दिखती 

 कैसे भुला देतें हैं लोग तेरी बनाई खुदाई  या खुदा
हम तो तेरा बनाया एक शख्स भी ना भुला सके 


क्यूँ कुछ सोच कर मै दिल अपना उदास करूँ 
लोग याद करते हैं उतना, जितनी अहमियत होती है हमारी 

Sunday, August 26, 2012

शमा

कोई अजनबी जब आता है उनकी महफ़िल में 
एक शमा उसी दम जलाई जाती है 
शमा जला कर उसी दम बुझाई जाती है 
और धुएँ की टिमटिमाती लाट की तरफ उंगली उठाई जाती है 
शमा जला कर शमा बुझा कर धुआं दिखा कर 
वो कहतें है आने वाले से 
खबरदार 
यहाँ आशिकों की ऐसी हालत बनाई जाती है 

ichchha

मेरा यार मिले मुझे उस वक़्त 
जब ना दिन हो ना रात हो 
एक वो और एक मैं होऊँ 
और मद्धम मद्धम बरसात हो 
ना वो बोलें ना मै बोलूं 
बस आँखों आँखों में बात हो 
आँखों में एक शरारत हो 
दिल में छलकता प्यार का अहसास हो 
चोरी चोरी एक दुसरे को तकते रहें 
काबू में ना हमारे ज़ज्बात हो
मरते दम तक ना हम भूल पायें
लम्हा वो इतना ख़ास हो
मरते दम तक ना हम भूल पायें
लम्हा वो इतना ख़ास हो

new shayree

गलतियों से जुदा 
तू भी नहीं मै भी नहीं 
पाक साफ़ खुदा 
तू भी नहीं मै भी नहीं 
मस्लेहाल ने कर दिया 
पैदा दोनों में इक्तिलाफ(ग़लतफ़हमी)
वरना फितरत का बुरा 
तू भी नहीं मै भी नहीं 
मुखाल्फतें( एक द्दोसरे की बात काटना ) सलामत 
दोनों का सफ़र ज़ारी रहा 
एक लम्हे को रुका
तू भी नहीं मै भी नहीं
चाहते बहुत है
एक दुसरे को हम
इस हकीक़त को मानता
तू भी नहीं मै भी नहीं

Friday, August 24, 2012

Friday, August 17, 2012

आज की पोस्ट ( शराब/ मयनोशी )

वो कहतें है शराब पीने वालों की दुआ कबूल ना होगी 
हम कहतें हैं शराब पीने वाले दुआ नहीं मांगते


जब मर कर ख़ाक हो जाऊं मै 
तो उस ख़ाक से एक सुराही बनाना 
उस सुराही को मैखाने में रख आना 
ताकि मिटटी मैखाने की रहे मैखाने में 
ख़ाक उड़ती ना फिरे सारे ज़माने में.


लोग कहते ए साकी बहुत मैखाने  इस ज़माने में हैं 
हमे तो पता है बस वो दो घूँट, जो इस पैमाने में हैं 

आज उतनी भी नहीं मैखाने में 
जितनी हम छोड़ देते थे पैमाने में 

कोई गंगाजल, कोई आब-ए-जमजम ना देना 
दम जब मेरा निकले मैय से होंठ मेरे तर कर देना 

सब छोड़ गए एक एक करके मेरा साथ 
बस वफादार एक यही मैखाना निकला 


जब खुदा का कहर टूटने को हुआ मेरे शहर पर 
कोई मंदिर मस्जिद गया, हम मैखाने आ गए 

एक रात और गुजरने दे तेरे मैखाने में 
कल हम ही गुज़र जायेंगे ज़माने से 

वो आँखों से पिलाए या जाम से 
साकी किसी को प्यासा जाने ना देंगी 

आज जाम ढाल दे सरे शाम साकी 
एक  पुराना जख्म उभर आया है 

गाफिल रहते  हैं  नशे में, किसी को क्या तकलीफ 

किसी से कोई मतलब नहीं , ना बद हैं ना हैं शरीफ 

पैमाना छलक गया तो कायनात हिल गयी 
मेरे हिस्से की घूँट यह जमीन पी गयी 
एक दिल मै भी इसी जमीन में समा जाऊँगा 
लोग बोलेंगे इस रिंद की पूरी मय हो गयी

जब ठुकरा दिया मुझे ज़िन्दगी ने 
सँभालने मुझे रिंदगी आ गयी 

उसने ठुकराया तो मैखाने ने पनाह दे दी 
कहाँ जाऊँगा गर इसने भी रुखसती दे दी 

संभाल साकी तेरा जाम, तेरा मैखाना 
इस रिंद की ज़िन्दगी अब बुझने को है 

साहिल पे बैठ कर पी रहे थे रिंद 
समंदर ने भी दो घूँट मांग ली 
दरयादिली देखो मयख्वारों की 
पूरी की पूरी बोतल उछाल दी 


   

Wednesday, August 15, 2012

    -              शायरी कुछ नयी 

    क्यूँ करता है अपनी वफ़ा का दावा फराज़ 
 हमने रूह को जिस्म से बेवफाई करते देखा है 

ज़िन्दगी बिता दी,जुदाई की एक घडी सम्भाली ना गई 
जीते समंदर लाखों, खरे पानी की बूँद संभाली ना गई 

बहुत जुदा है औरों से मेरे दर्द की कहानी यारों 
जख्म का निशाँ नहीं, दर्द की इन्तेहाँ नहीं 

सुना है तेरे दरबार में दुआ कबूल का वक़्त मुक़रर है मालिक  

यह तो बता किस वक़्त,मैंने दुआओं में,मैंने उसे नहीं माँगा 


क्यूँ क़यामत तक साथ देने का वादा करते हो यार 

   लोग  ज़नाज़े में भी काँधे बदल लेते हैं फ़राज़ 


चाहे तोड़ लिया हो तुमने हमसे हर रिश्ता फ़राज़ 

तेरे हिस्से का वक़्त आज भी तनहा गुजरता है 






Sunday, July 29, 2012

मेरी शायरी

 इस क़दर कीमती तो ना थे मेरे चैन-ओ-सुकून  फराज़ 
जिन्हें लूट कर ले गए वो, किसी खजाने की तरह 


बड़ी गुस्ताख है आपकी याद ऐ फराज़ 
थोड़ी तमीज इसको सिखा दीजीये
बिना दस्तक दिए दरवाज़े पर 
अक्सर मेरे दिल में आ जाती  है 


 अल्फाज़ तो बहुत थे मोहब्बत के बयाँ को,फराज़  
सोचा जो ज़ज्बात ना समझा वो अल्फाज़ क्या समझेगा  


यह जो गुज़र रही है, नाम उसका जिंदगी है फराज़ 
वर्ना दिल और ज़ज्बात को गुज़रे ज़माना हो गया 


वो मुझे भुलाने की धुन में है 
ये उनकी जीत नहीं, हार है 


चला जाऊँगा एक दिन उसे छोड़ कर उसके हाल पर 
क्या थी मेरी कीमत, उसे मेरे बाद ज़माना बता देगा 


उन्हें शक है, हम जान नहीं दे सकते उनकी खातिर
हमें डर है, बहुत रोयेंगे वो मुझे आजमाने के बाद 


किसी से क्या गिला इस ज़माने में, ऐ फराज़ 
शायद हम उनकी मोहब्बत के काबिल ही ना थे 


उनसे कहो ,फुरसत में याद करना है तो ना करे 
हम तनहा ज़रूर हैं फ़राज़ पर फ़िज़ूल नहीं है 

शायरी जो मै फराज़ नाम से लिखता हूँ

क्या सारी उम्र अधूरा रहा हूँ मै फराज़ 
जब रुकी साँसें तो लोग बोले ये पूरे हो गए 

सज़ा देने वाला रज़ा पूछता है क्यूँ 
जीने की मुझसे वज़ह पूछता है क्यूँ 
दिया था मुझे ज़हर जिसने, फराज़ 
हुआ असर कितना, आके पूछता है क्यूँ 

अजनबी तेरे शहर में मुझे पत्थर किसने मारा फराज़ 
लोगों की इस भीड़ में लगता है कोई अपना भी है.

भीगते रहें बारिशों में अक्सर 
कभी माँगी किसी से पनाह नहीं
हसरतें पूरी ना हो, ना सही फराज़ 
ख्वाब देखना कोई गुनाह नहीं 

दिल की बात जानता नहीं कोई 
कहना  मेरे ज़ज्बात का मानता नहीं कोई 
हम तो लुटा देते उनपर जान भी अपनी 
अहमियत  मेरी जान की जानता नहीं कोई 

किस तरह तोड़ लूं उनसे रिश्ता ऐ फराज़ 
याद भी  आ जाएँ तो ज़माने को भूल जाता हूँ 

ऐ ज़िंदगी अब तू ही रूठ जा हमसे 
रूठे  हुए अपने  अब मनाये नहीं मानते

वो साथ थे तो, ज़िंदगी लगती थी खुदा की नेमत 
फराज़ अब तो  हर साँस पूछती है जीने की वज़ह

उस शख्स की यादों में खोया रहता हूँ फराज़ 
जिसे मुझे याद करने को लम्हा नहीं मिलता 

अपनी वफ़ा का इस क़दर दावा ना कर फराज़ 
हमने रूह को जिस्म से बेवफाई करते देखा है 

आज ढूँढा मैंने उनको अपनी हस्ती में फराज़ 
हर जगह थे वो मौजूद, बस किस्मत को छोड़कर 

फराज़ पूछे कि लाश तैरती क्यूँ है पानी पर
हम बोले, अरे डूबने के लिए ज़िंदगी चाहिए 

शायरी

वो मिल गए हमें  आखिरकार , खुदा के दरबार मे 
अब आप ही कहिये, हम मोहब्बत करें या इबादत 


कुछ इस तरह थक गएँ हैं मेरी चाहतों के वजूद 
कि अब कोई अच्छा भी लगे तो हम इज़हार नहीं करते 


मै अपनी जिंदगी में सबको इसीलिए अहमियत देता हूँ,
वो अच्छे होंगे तो साथ देंगे, खराब होंगे तो देंगे सबक 


गिले शिकवे ना कभी दिल से लगा लेना 
   कभी मान जाना, कभी मना लेना 
कल का क्या पता कहाँ तुम कहाँ हम हो 
जब मौका मिले, हंसना और हंसा देना 


ना जाने कैसे उनसे इतनी मोहब्बत हो गयी उनसे 
कि उनकी खातिर मेरा दिल मुझसे रूठ जाता है अक्सर 

introduction of my poetry

dear readers
     i have started writing poetry at the age of 8 yrs. and today after 36 yrs the journey is on