Sunday, July 29, 2012

मेरी शायरी

 इस क़दर कीमती तो ना थे मेरे चैन-ओ-सुकून  फराज़ 
जिन्हें लूट कर ले गए वो, किसी खजाने की तरह 


बड़ी गुस्ताख है आपकी याद ऐ फराज़ 
थोड़ी तमीज इसको सिखा दीजीये
बिना दस्तक दिए दरवाज़े पर 
अक्सर मेरे दिल में आ जाती  है 


 अल्फाज़ तो बहुत थे मोहब्बत के बयाँ को,फराज़  
सोचा जो ज़ज्बात ना समझा वो अल्फाज़ क्या समझेगा  


यह जो गुज़र रही है, नाम उसका जिंदगी है फराज़ 
वर्ना दिल और ज़ज्बात को गुज़रे ज़माना हो गया 


वो मुझे भुलाने की धुन में है 
ये उनकी जीत नहीं, हार है 


चला जाऊँगा एक दिन उसे छोड़ कर उसके हाल पर 
क्या थी मेरी कीमत, उसे मेरे बाद ज़माना बता देगा 


उन्हें शक है, हम जान नहीं दे सकते उनकी खातिर
हमें डर है, बहुत रोयेंगे वो मुझे आजमाने के बाद 


किसी से क्या गिला इस ज़माने में, ऐ फराज़ 
शायद हम उनकी मोहब्बत के काबिल ही ना थे 


उनसे कहो ,फुरसत में याद करना है तो ना करे 
हम तनहा ज़रूर हैं फ़राज़ पर फ़िज़ूल नहीं है 

शायरी जो मै फराज़ नाम से लिखता हूँ

क्या सारी उम्र अधूरा रहा हूँ मै फराज़ 
जब रुकी साँसें तो लोग बोले ये पूरे हो गए 

सज़ा देने वाला रज़ा पूछता है क्यूँ 
जीने की मुझसे वज़ह पूछता है क्यूँ 
दिया था मुझे ज़हर जिसने, फराज़ 
हुआ असर कितना, आके पूछता है क्यूँ 

अजनबी तेरे शहर में मुझे पत्थर किसने मारा फराज़ 
लोगों की इस भीड़ में लगता है कोई अपना भी है.

भीगते रहें बारिशों में अक्सर 
कभी माँगी किसी से पनाह नहीं
हसरतें पूरी ना हो, ना सही फराज़ 
ख्वाब देखना कोई गुनाह नहीं 

दिल की बात जानता नहीं कोई 
कहना  मेरे ज़ज्बात का मानता नहीं कोई 
हम तो लुटा देते उनपर जान भी अपनी 
अहमियत  मेरी जान की जानता नहीं कोई 

किस तरह तोड़ लूं उनसे रिश्ता ऐ फराज़ 
याद भी  आ जाएँ तो ज़माने को भूल जाता हूँ 

ऐ ज़िंदगी अब तू ही रूठ जा हमसे 
रूठे  हुए अपने  अब मनाये नहीं मानते

वो साथ थे तो, ज़िंदगी लगती थी खुदा की नेमत 
फराज़ अब तो  हर साँस पूछती है जीने की वज़ह

उस शख्स की यादों में खोया रहता हूँ फराज़ 
जिसे मुझे याद करने को लम्हा नहीं मिलता 

अपनी वफ़ा का इस क़दर दावा ना कर फराज़ 
हमने रूह को जिस्म से बेवफाई करते देखा है 

आज ढूँढा मैंने उनको अपनी हस्ती में फराज़ 
हर जगह थे वो मौजूद, बस किस्मत को छोड़कर 

फराज़ पूछे कि लाश तैरती क्यूँ है पानी पर
हम बोले, अरे डूबने के लिए ज़िंदगी चाहिए 

शायरी

वो मिल गए हमें  आखिरकार , खुदा के दरबार मे 
अब आप ही कहिये, हम मोहब्बत करें या इबादत 


कुछ इस तरह थक गएँ हैं मेरी चाहतों के वजूद 
कि अब कोई अच्छा भी लगे तो हम इज़हार नहीं करते 


मै अपनी जिंदगी में सबको इसीलिए अहमियत देता हूँ,
वो अच्छे होंगे तो साथ देंगे, खराब होंगे तो देंगे सबक 


गिले शिकवे ना कभी दिल से लगा लेना 
   कभी मान जाना, कभी मना लेना 
कल का क्या पता कहाँ तुम कहाँ हम हो 
जब मौका मिले, हंसना और हंसा देना 


ना जाने कैसे उनसे इतनी मोहब्बत हो गयी उनसे 
कि उनकी खातिर मेरा दिल मुझसे रूठ जाता है अक्सर 

introduction of my poetry

dear readers
     i have started writing poetry at the age of 8 yrs. and today after 36 yrs the journey is on