Friday, August 17, 2012

आज की पोस्ट ( शराब/ मयनोशी )

वो कहतें है शराब पीने वालों की दुआ कबूल ना होगी 
हम कहतें हैं शराब पीने वाले दुआ नहीं मांगते


जब मर कर ख़ाक हो जाऊं मै 
तो उस ख़ाक से एक सुराही बनाना 
उस सुराही को मैखाने में रख आना 
ताकि मिटटी मैखाने की रहे मैखाने में 
ख़ाक उड़ती ना फिरे सारे ज़माने में.


लोग कहते ए साकी बहुत मैखाने  इस ज़माने में हैं 
हमे तो पता है बस वो दो घूँट, जो इस पैमाने में हैं 

आज उतनी भी नहीं मैखाने में 
जितनी हम छोड़ देते थे पैमाने में 

कोई गंगाजल, कोई आब-ए-जमजम ना देना 
दम जब मेरा निकले मैय से होंठ मेरे तर कर देना 

सब छोड़ गए एक एक करके मेरा साथ 
बस वफादार एक यही मैखाना निकला 


जब खुदा का कहर टूटने को हुआ मेरे शहर पर 
कोई मंदिर मस्जिद गया, हम मैखाने आ गए 

एक रात और गुजरने दे तेरे मैखाने में 
कल हम ही गुज़र जायेंगे ज़माने से 

वो आँखों से पिलाए या जाम से 
साकी किसी को प्यासा जाने ना देंगी 

आज जाम ढाल दे सरे शाम साकी 
एक  पुराना जख्म उभर आया है 

गाफिल रहते  हैं  नशे में, किसी को क्या तकलीफ 

किसी से कोई मतलब नहीं , ना बद हैं ना हैं शरीफ 

पैमाना छलक गया तो कायनात हिल गयी 
मेरे हिस्से की घूँट यह जमीन पी गयी 
एक दिल मै भी इसी जमीन में समा जाऊँगा 
लोग बोलेंगे इस रिंद की पूरी मय हो गयी

जब ठुकरा दिया मुझे ज़िन्दगी ने 
सँभालने मुझे रिंदगी आ गयी 

उसने ठुकराया तो मैखाने ने पनाह दे दी 
कहाँ जाऊँगा गर इसने भी रुखसती दे दी 

संभाल साकी तेरा जाम, तेरा मैखाना 
इस रिंद की ज़िन्दगी अब बुझने को है 

साहिल पे बैठ कर पी रहे थे रिंद 
समंदर ने भी दो घूँट मांग ली 
दरयादिली देखो मयख्वारों की 
पूरी की पूरी बोतल उछाल दी 


   

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