Tuesday, October 9, 2012

एक चेहरे के मुरीद हम कुछ इस क़दर हुए 
आईने के सामने भी अपनी सूरत नहीं दिखती


वक़्त के साथ हर चीज़ बदल जाती है 
हर याद, हर शै पर धूल चढ़ जाती है 
तस्वीर उनकी दिल के ऐसे कोने में रखी है 
जहां सांसें भी पूछ कर जाती है 



सुकून से आँखे बंद कर नहीं पाता रातों को 
टूटे हुए खवाब की किरचें चुभती हैं पुतली में



बेखबर हो गए हैं कुछ लोग 
वो हमारी ज़रूरत तक महसूस नहीं करते 
कभी बहुत बाते किया करते थे हमसे 
अब खैरियत तक पूछा नहीं करते 



मेरे ज़ख्मों की दवा कौन बनाएगा तेरे जाने के बाद  
हमने तो अपने भी खो दिए, तुझे पाने की खातिर 




 सज़ा बन जाती है गुज़रे हुए वक़्त की यादें 
जाने क्यूँ मतलब के लिए मेहरबान होते हैं लोग




कैसे भुला देते हैं लोग तेरी बनाई  खुदाई को ऐ रब्बा 
हमसे तो तेरा बनाया एक शख्स भी भुलाया ना  गया 




उदासियों की तो वजह बहुत हैं इस ज़माने मे 
पर बेवजह खिलखिलाने में मज़ा अलग ही आता है 



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