- शायरी कुछ नयी
क्यूँ करता है अपनी वफ़ा का दावा फराज़
हमने रूह को जिस्म से बेवफाई करते देखा है
ज़िन्दगी बिता दी,जुदाई की एक घडी सम्भाली ना गई
जीते समंदर लाखों, खरे पानी की बूँद संभाली ना गई
बहुत जुदा है औरों से मेरे दर्द की कहानी यारों
जख्म का निशाँ नहीं, दर्द की इन्तेहाँ नहीं
सुना है तेरे दरबार में दुआ कबूल का वक़्त मुक़रर है मालिक
यह तो बता किस वक़्त,मैंने दुआओं में,मैंने उसे नहीं माँगा
क्यूँ क़यामत तक साथ देने का वादा करते हो यार
लोग ज़नाज़े में भी काँधे बदल लेते हैं फ़राज़
चाहे तोड़ लिया हो तुमने हमसे हर रिश्ता फ़राज़
तेरे हिस्से का वक़्त आज भी तनहा गुजरता है
क्यूँ करता है अपनी वफ़ा का दावा फराज़
हमने रूह को जिस्म से बेवफाई करते देखा है
ज़िन्दगी बिता दी,जुदाई की एक घडी सम्भाली ना गई
जीते समंदर लाखों, खरे पानी की बूँद संभाली ना गई
बहुत जुदा है औरों से मेरे दर्द की कहानी यारों
जख्म का निशाँ नहीं, दर्द की इन्तेहाँ नहीं
सुना है तेरे दरबार में दुआ कबूल का वक़्त मुक़रर है मालिक
यह तो बता किस वक़्त,मैंने दुआओं में,मैंने उसे नहीं माँगा
क्यूँ क़यामत तक साथ देने का वादा करते हो यार
लोग ज़नाज़े में भी काँधे बदल लेते हैं फ़राज़
चाहे तोड़ लिया हो तुमने हमसे हर रिश्ता फ़राज़
तेरे हिस्से का वक़्त आज भी तनहा गुजरता है
No comments:
Post a Comment