Sunday, August 26, 2012

शमा

कोई अजनबी जब आता है उनकी महफ़िल में 
एक शमा उसी दम जलाई जाती है 
शमा जला कर उसी दम बुझाई जाती है 
और धुएँ की टिमटिमाती लाट की तरफ उंगली उठाई जाती है 
शमा जला कर शमा बुझा कर धुआं दिखा कर 
वो कहतें है आने वाले से 
खबरदार 
यहाँ आशिकों की ऐसी हालत बनाई जाती है 

ichchha

मेरा यार मिले मुझे उस वक़्त 
जब ना दिन हो ना रात हो 
एक वो और एक मैं होऊँ 
और मद्धम मद्धम बरसात हो 
ना वो बोलें ना मै बोलूं 
बस आँखों आँखों में बात हो 
आँखों में एक शरारत हो 
दिल में छलकता प्यार का अहसास हो 
चोरी चोरी एक दुसरे को तकते रहें 
काबू में ना हमारे ज़ज्बात हो
मरते दम तक ना हम भूल पायें
लम्हा वो इतना ख़ास हो
मरते दम तक ना हम भूल पायें
लम्हा वो इतना ख़ास हो

new shayree

गलतियों से जुदा 
तू भी नहीं मै भी नहीं 
पाक साफ़ खुदा 
तू भी नहीं मै भी नहीं 
मस्लेहाल ने कर दिया 
पैदा दोनों में इक्तिलाफ(ग़लतफ़हमी)
वरना फितरत का बुरा 
तू भी नहीं मै भी नहीं 
मुखाल्फतें( एक द्दोसरे की बात काटना ) सलामत 
दोनों का सफ़र ज़ारी रहा 
एक लम्हे को रुका
तू भी नहीं मै भी नहीं
चाहते बहुत है
एक दुसरे को हम
इस हकीक़त को मानता
तू भी नहीं मै भी नहीं

Friday, August 24, 2012

Friday, August 17, 2012

आज की पोस्ट ( शराब/ मयनोशी )

वो कहतें है शराब पीने वालों की दुआ कबूल ना होगी 
हम कहतें हैं शराब पीने वाले दुआ नहीं मांगते


जब मर कर ख़ाक हो जाऊं मै 
तो उस ख़ाक से एक सुराही बनाना 
उस सुराही को मैखाने में रख आना 
ताकि मिटटी मैखाने की रहे मैखाने में 
ख़ाक उड़ती ना फिरे सारे ज़माने में.


लोग कहते ए साकी बहुत मैखाने  इस ज़माने में हैं 
हमे तो पता है बस वो दो घूँट, जो इस पैमाने में हैं 

आज उतनी भी नहीं मैखाने में 
जितनी हम छोड़ देते थे पैमाने में 

कोई गंगाजल, कोई आब-ए-जमजम ना देना 
दम जब मेरा निकले मैय से होंठ मेरे तर कर देना 

सब छोड़ गए एक एक करके मेरा साथ 
बस वफादार एक यही मैखाना निकला 


जब खुदा का कहर टूटने को हुआ मेरे शहर पर 
कोई मंदिर मस्जिद गया, हम मैखाने आ गए 

एक रात और गुजरने दे तेरे मैखाने में 
कल हम ही गुज़र जायेंगे ज़माने से 

वो आँखों से पिलाए या जाम से 
साकी किसी को प्यासा जाने ना देंगी 

आज जाम ढाल दे सरे शाम साकी 
एक  पुराना जख्म उभर आया है 

गाफिल रहते  हैं  नशे में, किसी को क्या तकलीफ 

किसी से कोई मतलब नहीं , ना बद हैं ना हैं शरीफ 

पैमाना छलक गया तो कायनात हिल गयी 
मेरे हिस्से की घूँट यह जमीन पी गयी 
एक दिल मै भी इसी जमीन में समा जाऊँगा 
लोग बोलेंगे इस रिंद की पूरी मय हो गयी

जब ठुकरा दिया मुझे ज़िन्दगी ने 
सँभालने मुझे रिंदगी आ गयी 

उसने ठुकराया तो मैखाने ने पनाह दे दी 
कहाँ जाऊँगा गर इसने भी रुखसती दे दी 

संभाल साकी तेरा जाम, तेरा मैखाना 
इस रिंद की ज़िन्दगी अब बुझने को है 

साहिल पे बैठ कर पी रहे थे रिंद 
समंदर ने भी दो घूँट मांग ली 
दरयादिली देखो मयख्वारों की 
पूरी की पूरी बोतल उछाल दी 


   

Wednesday, August 15, 2012

    -              शायरी कुछ नयी 

    क्यूँ करता है अपनी वफ़ा का दावा फराज़ 
 हमने रूह को जिस्म से बेवफाई करते देखा है 

ज़िन्दगी बिता दी,जुदाई की एक घडी सम्भाली ना गई 
जीते समंदर लाखों, खरे पानी की बूँद संभाली ना गई 

बहुत जुदा है औरों से मेरे दर्द की कहानी यारों 
जख्म का निशाँ नहीं, दर्द की इन्तेहाँ नहीं 

सुना है तेरे दरबार में दुआ कबूल का वक़्त मुक़रर है मालिक  

यह तो बता किस वक़्त,मैंने दुआओं में,मैंने उसे नहीं माँगा 


क्यूँ क़यामत तक साथ देने का वादा करते हो यार 

   लोग  ज़नाज़े में भी काँधे बदल लेते हैं फ़राज़ 


चाहे तोड़ लिया हो तुमने हमसे हर रिश्ता फ़राज़ 

तेरे हिस्से का वक़्त आज भी तनहा गुजरता है