क्या सारी उम्र अधूरा रहा हूँ मै फराज़
जब रुकी साँसें तो लोग बोले ये पूरे हो गए
सज़ा देने वाला रज़ा पूछता है क्यूँ
जीने की मुझसे वज़ह पूछता है क्यूँ
दिया था मुझे ज़हर जिसने, फराज़
हुआ असर कितना, आके पूछता है क्यूँ
अजनबी तेरे शहर में मुझे पत्थर किसने मारा फराज़
लोगों की इस भीड़ में लगता है कोई अपना भी है.
भीगते रहें बारिशों में अक्सर
कभी माँगी किसी से पनाह नहीं
हसरतें पूरी ना हो, ना सही फराज़
ख्वाब देखना कोई गुनाह नहीं
दिल की बात जानता नहीं कोई
कहना मेरे ज़ज्बात का मानता नहीं कोई
हम तो लुटा देते उनपर जान भी अपनी
अहमियत मेरी जान की जानता नहीं कोई
किस तरह तोड़ लूं उनसे रिश्ता ऐ फराज़
याद भी आ जाएँ तो ज़माने को भूल जाता हूँ
ऐ ज़िंदगी अब तू ही रूठ जा हमसे
रूठे हुए अपने अब मनाये नहीं मानते
वो साथ थे तो, ज़िंदगी लगती थी खुदा की नेमत
फराज़ अब तो हर साँस पूछती है जीने की वज़ह
उस शख्स की यादों में खोया रहता हूँ फराज़
जिसे मुझे याद करने को लम्हा नहीं मिलता
अपनी वफ़ा का इस क़दर दावा ना कर फराज़
हमने रूह को जिस्म से बेवफाई करते देखा है
आज ढूँढा मैंने उनको अपनी हस्ती में फराज़
हर जगह थे वो मौजूद, बस किस्मत को छोड़कर
फराज़ पूछे कि लाश तैरती क्यूँ है पानी पर
हम बोले, अरे डूबने के लिए ज़िंदगी चाहिए
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